जरा सोचिए। एक मजदूर, जो दिनभर पसीना बहाकर सौ रुपये कमाता है, उसमें से दस रुपये निकालकर मंदिर के दान-पात्र में डाल देता है। उसे नहीं पता कि वो पैसा किस अकाउंट में जाएगा, कौन गिनेगा। उसे बस इतना पता है — भगवान का भवन बनेगा, और उसे सुकून मिलेगा।
यही भारत की आस्था है — हिसाब नहीं माँगती, सिर्फ भरोसा करती है। और यही भरोसा है जिसे, आरोप है, गिनती के कमरे में बैठे कुछ लोगों ने नोटों के बंडल में दबा-दबाकर लूट लिया।
जब फिरोजाबाद हारे, तो मंदिर का हवाला दिया गया
याद कीजिए वो दिन, जब फिरोजाबाद की सीट समाजवादी पार्टी के अवधेश कुमार जीत गए थे। उस हार को पचा न पाने वाले भाजपा नेताओं ने अयोध्यावासियों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था — "हमने मंदिर बनवा दिया, फिर भी हरा दिया।"
इंटरव्यू उनके, जिन्हें फँसाया जा रहा है
जो गोदी मीडिया नरेंद्र मोदी जी का नाम लेते नहीं थकता, वह आजकल किसके इंटरव्यू ले रहा है? उन छोटे कर्मचारियों के — काउंटिंग रूम में बैठने वाले, ड्राइवर, सुपरवाइज़र — जिन्हें इस मामले में फँसाया जा रहा है।
जब काउंटिंग रूम के सबसे छोटे कर्मचारी तक से पूछताछ हो सकती है, तो ट्रस्ट के सबसे बड़े पदों पर बैठे लोगों से बराबर सवाल क्यों नहीं?
जाँच करने वाला भी वही, फैसला सुनाने वाला भी वही
योगी जी ने न्याय के नाम पर जो दिया, वह एक SIT है — जिसका नेतृत्व खुद राम मंदिर ट्रस्ट के ही लोग करेंगे। यानी जिस संस्था पर आरोप लगा है, उसी के लोग अपनी जाँच खुद करेंगे, और फैसला भी खुद सुनाएँगे। यह न्याय है, या न्याय का नाटक?
भारतीय मज़दूर का फैसला
मैं और मेरी पूरी टीम वर्षों से भाजपा को वोट देते आए हैं। लेकिन बीस दिनों की यह चुप्पी अब उस भरोसे को हिला रही है।
जो पैसा एक गरीब आदमी की मेहनत की कमाई से, सिर्फ इस भरोसे पर निकला कि भगवान का भवन बनेगा — उस भरोसे के साथ खिलवाड़ करने वाला, चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, बख़्शा नहीं जाना चाहिए।