जरा सोचिए। एक मजदूर, जो दिनभर पसीना बहाकर सौ रुपये कमाता है — उसमें से दस रुपये निकालकर petrol डलवाता है। उसे नहीं पता कि उसकी tank में अब क्या जा रहा है। उसे बस इतना पता है — गाड़ी चलनी चाहिए।
भाजपा सरकार ने E20 पेट्रोल — यानी 20% एथनॉल मिला हुआ पेट्रोल — आपकी गाड़ी में डालना शुरू कर दिया। बताया नहीं, पूछा नहीं, label नहीं लगाया। बस चुपचाप डाल दिया। और जब आपने पूछा — जवाब मिला: "राष्ट्रीय हित में है।"
2030 का वादा, 2025 में लागू — क्यों?
2018 में सरकार ने खुद कहा था — 2030 तक E20 लागू करेंगे। क्योंकि सरकार की ही रिसर्च बोल रही थी कि तब तक पुरानी गाड़ियाँ बदल जाएँगी, कंपनियों को इंजन बनाने का वक्त मिलेगा।
2022 में 10% target जल्दी hit हो गया — और vote का मौका दिखा। Deadline खिंच गई 2025 पर। दिसंबर 2025 में E20 पूरे देश में लागू। पाँच साल पहले। जब सरकार की अपनी रिपोर्ट कह रही थी कि 20% से भी कम गाड़ियाँ E20 compatible थीं।
Hardeep Puri का "Racing Car" तर्क
पेट्रोलियम मंत्री Hardeep Puri ने कहा — "यह fuel racing cars में चलता है।" बिल्कुल सही। लेकिन racing cars के इंजन एथनॉल के लिए खास बनाए जाते हैं। मालिक ने जानते-बूझते वो fuel चुना।
मर्सिडीज़ diesel गाड़ी में कोई चुपके से petrol नहीं डाल देता। हमारे pump पर वही पुराना बोर्ड — लेकिन अंदर से fuel बदल गया।
फायदे और नुकसान
✅ असली फायदे
- भारत का 90% तेल import — dependency घटेगी
- ₹1.44 लाख करोड़ foreign exchange बचा
- Pollution normal petrol से कम
- Sugarcane farmers को फायदा
❌ असली नुकसान
- पुरानी गाड़ियों में mileage 3-7% गिरती है
- Rubber parts, injectors को खतरा
- Compatible इंजन महंगे हैं
- कोई विकल्प नहीं — US, EU में pure petrol मिलता है
भारतीय मज़दूर का फैसला
E20 एक अच्छी सोच है। Long term में भारत को यह करना ही होगा। लेकिन हर अच्छी सोच को vote के नज़रिए से implement करने वाली सरकार देश का नुकसान करती है।
1500 रुपये EMI की bike का मालिक "marginal change" afford नहीं कर सकता। उसके लिए engine seize होना घर का बजट टूटना है।